रविवार, 31 जनवरी 2010
रविवार, 24 जनवरी 2010
Antarvasna Email Club Message
"मामू की चुद गई"
आज अन्तर्वासना के कथा-भण्डार से आपके लिए प्रस्तुत है शमीम बानो कुरेशी द्वारा प्रेषित कहानी !
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*-*-*-*-*-*-*-*-* "मामू की चुद गई" -*-*-*-*-*-*-*-*-*
लौड़ा मोटा हो तो चूत में लेने का आनन्द बहुत ही आनन्द आता है। यूं तो बाईस की उम्र तक मैंने कई लण्ड खाये हैं, पर ऐसा कोई लण्ड नहीं मिला जो मेरी चूत को अपने मोटे होने का अहसास करा सके। मेरी सहेली सीमा भी मेरे घर में एक कमरे में किराये से रहती थी। वो भी मेरी ही तरह चुदक्कड़ थी। अधिकतर मैं तो उसी के कमरे में चुदा लिया करती थी।
मेरे अब्बू ने आज मुझे बताया कि मेरे मामू आज ही बनारस पहुंच रहे हैं, कार ले जा और उन्हें ले आना। मैंने सीमा को बताया कि मेरे मामू जान आ रहे हैं, उन्हें लेने स्टेशन चलना है। हम दोनों दस बजे ही रेलवे स्टेशन पर पहुंच गये थे। प्लेटफ़ार्म पर गाड़ी के पहुंचने की लगातार सूचना दी जा रही थी। नियत समय पर ट्रेन आ गई। ए सी थ्री टियर हमने पूरा खोज मारा पर मामू जैसा उम्र का कोई व्यक्ति नजर नहीं आया।
"ये मादरचोद मामू, जाने कहां मर गया !" मैं बड़बड़ाने लगी।
"अरे चल बानो, उसकी मां चुदने दे, निकल अब !" सीमा भी परेशान हो गई थी।
"ओह कैसे चूतिये टाईप के लोग होते हैं ... चल अब !"
हम दोनों स्टेशन के बाहर आ गये। दूर से ही मैंने देखा कि एक सुन्दर सा युवक मेरी कार का नम्बर देख रहा था। हम दोनों लपक कर वहाँ पहुँच गये।
"भोंसड़ी के अपने बाप की गाड़ी समझ रखी है क्या ...? चल दूर हट !"
वो युवक घबरा गया इस हमले से। दो खूबसूरत हसीनायें देख कर वो भी मुस्करा उठा।
"अरे नहीं, आपा ने गाड़ी भेजी थी ... बस नम्बर देख रहा था !"
"आपा के बच्चे, हमें चूतिया समझ रखा है क्या? भाग यहां से ... मादरचोद जहां लड़की देखी ... बस लौड़ा हिलाने लगा !" मैं बिफ़र गई।
"बाप रे ! ये तो बलायें है ... माफ़ करना जी !!" हमारी गालियाँ सुन कर तो उसके होश ही उड़ गये।
अचनक सीमा बोली,"आपका नाम ...?"
"जी ! रहने दीजिये ... वैसे अनवर नाम है।"
हम दोनों के मुख से जैसे चीख निकल गई। जिसे हमने मां-बहन की गालियां दे डाली थी, वही मामू निकला। पर इतना जवान ... मामू को तो 40 या 50 का तो होना ही चाहिये था। जैसे तैसे हमने माफ़ी मांगी और उसे गाड़ी में बैठा दिया।
मैं ड्राईव कर रही थी और वो मेरे पास बैठा था। मैं तिरछी निगाहों से उसे देखती रही, बला का सुन्दर था वो। उसकी टाईट जीन्स पर मेरी नजर जा कर ठहर गई। लगता था साले का लण्ड सोलिड मोटा था। लण्ड का उभार जरा अधिक ही था। बस हम तो चुद्दक्कड़ रांडे थी, मन था कि वहीं फ़ंस कर रह गया।
"मुझे माफ़ कर देना ... अब्बू को मत कहना !"
"बानो जी, यही अदायें तो हमारे दिल जिगर को छू जाती हैं !"
"अनवर जी, मैं सीमा हूं, मुझे भी ... !" सीमा झिझकती हुई बोली।
"भई, आपने तो मुझे चूतिया, भोंसड़ी जैसी मधुर गालियां दी, अगर मैं भी आपको भोंसड़ी वाली कहूँ तो?" अनवर ने मजाक में कहा।
"वो तो हम हैं ही ..." मैंने शर्मा कर कहा।
"आये हाये ... मार डाला रे ! बानो जी !"
घर आते ही अब्बू ने डांट लगाई,"कहाँ से माँ चुदा कर इतनी देरी से आ रही है ... ये सीमा क्या गांड मराने के लिये गई थी?"
"अब्बू, देखो तो मामूजान आये हैं।"
"अच्छा लगा, मुझे जान ही कह करो।" फिर भाग कर अम्मी और अब्बू के हाथ चूमें और अम्मी के कमरे में चला गया। हम दोनों ने एक दूसरे को देखा और खुशी से उछल पड़े।
"देखा, साले का लण्ड पेण्ट में से ही कैसा नजर आ रहा था।"
"बानो, यार बहुत मोटा लगता है ... देख पंछी जाने ना पाये!"
"ये चूत को मस्त तो कर ही देगा, पर गाण्ड झेल पायेगी क्या ?" हम दोनों हंस पड़े।
"इतने लिये हैं ... इसे भी समझ लेंगे ... वो स्पेशल क्रीम है ना, जोर की चिकनी है।"
हम दोनों ही ख्वाबों की दुनिया में खो से गये। अम्मी उसे ऊपर वाले कमरे में उसका सामान सेट कर रही थी। जो हमारा फ़ेवरेट कमरा था। अपना सामान जमा कर अनवर कुछ ही देर में नीचे आ गया।
"बानो, समय मिले तो ऊपर कमरे में आ जाना ...!"
मेरा दिल धक से रह गया। ये तो बड़ा चालू निकला।
"क्यूं ... मैं क्यूँ आऊँ भला ?"
"अरे यूँ ही बात करेंगे ... चाहे तो सीमा को भी ले आना ..."
"ओह ... जरूर ... और आप तो मेरे मामू जान हैं ना ..."
मैंने जान जरा जोर दे कर कहा तो वो मुस्करा दिया। उसकी मुस्कराहट ने मेरे दिल में बर्छियां चला दी। मैं भी मुस्करा दी।
शाम को मैंने और सीमा ने छोटा सा स्कर्ट और एक ढीला सा टॉप पहन लिया। जाहिर था इसमें कुछ भी करने में कपड़ों की खोला-खाली के झंझट से बचा जा सकता था। फिर मैं और सीमा उसके कमरे की तरफ़ बढ़ चले। दिल में दोनों के चुदाई की हसरत थी।
हम दोनों ही कमरे में अन्दर पहुंच गई। उस समय वो गहरी नींद में था। उसकी लुंगी एक तरफ़ सरकी हुई थी। उसने अन्दर चड्डी नहीं पहनी थी। हम दोनों एक दूसरे को देख कर मुस्कराये। हमें शरारत सूझी। उसकी लुंगी की गांठ हमने धीरे से खोल दी और उसे नंगा कर दिया। मेरा जी धड़कने लगा, सच में उसका लण्ड मोटा और लम्बा था। शायद सात इन्च का तो होगा, फ़ूल कर ना जाने कितना हो जायेगा।
सीमा ने हाथ बढ़ा कर उसे पकड़ना चाहा, पर मैंने उसे कहा कि जाग जायेगा तो कहीं बुरा ना मान जाये। इतना मोटा और लम्बा लण्ड देख कर उसके मुह में पानी आ गया। मुझे भी जैसे अपने जिस्म में वो घुसता सा मह्सूस होने लगा। तभी उसने करवट ली, उसके सुडौल चूतड़ों ने तो मेरा मन मोह लिया। एक दम गोरे और चिकने, भरपूर गोलाई लिये हुये थे। मैंने अपनी चूत दबा ली और सीमा का हाथ थाम लिया।
"सीमा, इसने तो मुझे घायल ही कर दिया है ..." मेरे मुख से आह निकल गई।
"बानो, मेरी चूत का हाल तो देख ... साली गीली हो गई है।" सीमा की तो हालत ही खराब थी।
हम दोनों वापस बाहर आ गईं। अपनी हालत देख कर हम दोनों को ही हंसी आ गई। हमने दरवाजा बन्द करके उसे खटखटाया।
"कौन है? ... अभी आया ... ये लुंगी भी ना ...!" उसकी नींद भरी आवाज आई। अनवर लुंगी बांध कर बाहर आया ...
"अरे बानो ... आओ ... अन्दर आ जाओ ..." हम दोनों की शरारत भरी मुस्कान देख कर वो कुछ झेंप सा गया।
"अनवर जी क्या हो रहा था ...?"
"बस खूबसूरत से सपने आ रहे थे ... नींद में खलल डाल दिया ... दोनों ही आई हो ... क्या बात है?"
"बस आपके सपने का एक हिस्सा चाहिये था ... "
" बानो जी एक बात बोलूं ... आपकी टांगें बहुत सुन्दर हैं ... चिकनी चिकनी ... ऊंची स्कर्ट में तो अन्दर तक हाय ... अब क्या कहूँ ..."
"और अनवर जी, मेरी कैसी हैं ...?" सीमा उत्सुकता से बोली, उसने अपनी भी स्कर्ट ऊपर कर ली।
"थोड़ा स्कर्ट और ऊपर करो तो पता चले ... अच्छा छूने से भी मालूम हो जायेगा !" उसने पास खड़ी सीमा की टांगें जांघ तक सहला दी।
"हाय छोड़ो जी, मेरी तो फ़ुद्दी तक कांप गई !" सीमा ने आखिर तीर मार ही दिया।
"और बानो जी आपकी फ़ुद्दी ...?"
"मरा भेनचोद, सीधे फ़ुद्दी तक पहुंच गया !" मैंने गुस्सा दिखाया।
"तो चलो सीमा जी, आप ही दर्शन करा दो फ़ुद्दी के ..."
"फिर आप भी मुन्ने मियां की झलक दिखा दोगे ना?" सीमा तो बस चुदाने को आतुर थी।
"अजी ये लो ... हम पहले ही बता देते हैं ..." और पलक झपकते ही उसने लुन्गी ऊपर उठा दी। इस बार लण्ड सोया हुआ नहीं था बल्कि तन कर आठ इन्च का हो गया था। कटी खाल में उसका लाल सुपाड़ा चमक रहा था। मैंने झपट कर लुन्गी उसके ऊपर फिर से डाल दी।
"बड़े तीस मार खां बनते हो ... ये तो सिर्फ़ दिखाने भर का है ... कितना दम है कैसे पता चले?"
"अरे साली ... भेन की लौड़ी ... तेरी तो चूत मारूँ ... आजा लेट जा यहाँ ... फिर दिखाता हूँ दम !"
"हां बानो ... चल लेट जा इसके नीचे ... देखे तो कितना दम है इसके लण्ड में ...?"
"ये बात है ... हट चल ... मुझे लेटने दे ..." मैंने मन की खुशी छिपाते हुये कहा। मेरा मन बल्लियों उछल रहा था। अब चुदने का मजा आयेगा। मैं झट से बिस्तर पर सीधे लेट गई।
"भेन का लण्ड मारूँ ... चड्डी कौन उतारेगा ... साली की पोन्द तो देख, क्या मस्तानी है !"
मैंने बिना देर किये चड्डी उतार दी ... जवानी से भरे सुन्दर उभारों को वो एक टक देखता ही रह गया। तभी सीमा ने अपना जलवा दिखा दिया। ऊपर का टॉप उसने उतार डाला। दोनों चूंचियां उछल कर बाहर दमकने लगी। अनवर की आंखें बाहर को उबली पड़ रही थी।
दो खूबसूरत हसीनायें उसके सामने थी। एक की चूत सामने थी तो दूसरे की तनी हुई चूंचियां उसे बुला रही थी। उसे अपनी तकदीर पर विश्वास ही नहीं हुआ। तभी अनवर का तन्नाया हुआ लण्ड मेरे हाथो में आ गया।
सीमा ने उसके चेहरे को अपनी छातियों से दबा लिया। मैंने भी अब अपना टॉप ऊपर करके अपनी चूंचियां नंगी कर ली। मेरा हाथ उसके लण्ड पर फ़िसलने लगा। पर हाय अल्लाह ये क्या ... तेज गति से उसका वीर्य निकल पड़ा।
मुझे एकदम से विश्वास नहीं हुआ। पर लण्ड तो पिचकारी मारते हुये खाली हुआ जा रहा था। सीमा ने निराशा से मुझे देखा।
"ले इसकी तो मां चुद गई !" सीमा ने हताश होते हुये कहा।
"कुछ देर में फिर से कोशिश करते हैं !" मैंने सीमा को फिर से ट्राई करने को कहा।
हमने थोड़ी देर तो इन्तज़ार किया, और उसका लण्ड सहलाया और मसला, उत्तेजना के मारे फिर से तन्ना गया। मैंने उसे अपने ऊपर गिरा लिया। उसने अपना चूत में घुसाने की कोशिश की, पर हाय ! उसका चूत से छूना ही था कि उसका वीर्य फिर से निकल गया।
मैंने गुस्से में आकर अब्दुल को फोन किया। इससे तो अब्दुल ही अच्छा था। ये तो गाँडू चूत में आग लगा कर खुद ठण्डा हो गया। कुछ ही समय में अब्दुल वहां हाज़िर था।
"क्या हो गया बानो ... "
फिर देख कर वो सारा माजरा समझ गया। उसने फोन करके युसुफ़ को भी बुला लिया। अब्दुल की नजरें सीमा पर थी। उसके लिये तो सीमा नई थी। मुझे अब्दुल को देखते ही मालूम चल गया। सीमा को मैंने इशारा कर दिया, और वो मुस्करा कर उसकी ओर बढ़ गई।
तभी युसुफ़ भी आ गया। आते ही वो मुझ पर लपका।
"अरे रुक तो, पहले हमारे अनवर जी को मस्त कर दे !"
"वो कैसे ?" युसुफ़ ने ताज्जुब से मुझे देखा।
"अनवर की गाण्ड बहुत प्यासी लग रही ... है ना अनवर जी? ... यूसुफ़ गाण्ड बहुत प्यारी मारता है, आगे का काम नहीं करे तो पीछे का काम में ले लेना चहिये !"
वो क्या कहता ... शरम के मारे चुप ही रहा। युसुफ़ को वैसे भी गाण्ड मारना अच्छा लगता था। सो उसने अनवर की गाण्ड देखी, चिकनी थी। उसने क्रीम उठाई और अनवर की गाण्ड में थपकियां दे कर उसकी दरार को खोल दी और चिकनाई लगा दी। फिर उसे झुका दिया और उसकी गाण्ड पर अपना लण्ड टिका दिया। कुछ ही देर में अनवर की गाण्ड चुद रही थी।
मैंने यूं ही मजा लेने के लिये अनवर का लण्ड पकड़ लिया और मुठ मारने लगी। उसका माल तुरन्त ही निकल पड़ा, और नीचे टपकने लगा। मैंने उसका वीर्य थोड़ा सा हाथ में लिया और उसके लण्ड में लग़ा कर उसे चिकना कर दिया और फिर उसे खींच कर जैसे दूध दुहते है , वैसे खींचने लगी। उसका फिर से माल निकल पड़ा ...
अब वो चिल्ला उठा ..."बस तेरी मां की चूत, कब तक मेरी गाण्ड मारोगे?"
तब युसुफ़ ने अपना लौड़ा बाहर खींच लिया और मुझे घोड़ी बना कर मेरी चूत में घुसा डाला। उधर अब्दुल को जैसे नई लौंडिया मिल गई थी सो सीमा को मस्ती से चोद रहा था। सीमा भी मस्ती ने खूब सिसकारियाँ भर कर चुदवाने में लगी थी। इधर मेरी चूत में जाना पहचाना लण्ड अन्दर बाहर हो रहा था। अनवर ने भी मौका नहीं छोड़ा और मेरे स्तन को दबा कर मस्ती लेने लगा था।
मुझे भी बहुत मजा आने लगा था। कुतिया की भांति मैं भी अपनी गाण्ड हिला हिला कर चुदवाने लगी।
अनवर भी ना जाने किस मिट्टी का बना था, चार बार तो वह स्खलित हो चुका था। अब फिर वो उत्तेजना के कारण फिर झड़ गया। झड़ने के नाम पर मात्र दो बूंदे ही वीर्य की बाहर आई। कुछ देर में सीमा भी सिसकारियां भरती हुई झड़ गई। मुझसे भी उत्तेजना सहन नहीं हो पा रही थी। मैंने भी बल खा कर अपना पानी छोड़ दिया। अनवर ने युसुफ़ के लण्ड पर जोर से मुठ मार दी और उसने भी अपना वीर्य निकाल डाला।
हम पांचों ही ठीक से कपड़े पहन कर तैयार हो गये थे। सीमा ने अपने बैग में से मेकअप का सामान निकाला और अपना चेहरा ठीक कर लिया। मैंने भी उसी के सामान से मेक अप कर लिया।
"अनवर जी, आपने तो हमारी जान ही निकाल दी थी।" मैंने अनवर से हंस कर कहा।
"बानो जी, मेरा लण्ड चाहे कितना भी सोलिड लगे, पर लड़की दिखी कि बस माल ही निकल जाता है।"
"तो मानते हो ना कि हम मस्त माल हैं, इतने सोलिड लण्ड की भी मैय्या चोद दी। सीमा को देख, अच्छों अच्छों का निकाल देती है, फिर मुझे तो खुद अभी तक कोई मोटा भुसुन्ड लण्ड मिला ही नहीं !"मैंने अनवर को बढ़ावा दिया।
हम सभी चुद चुकी थी। हमारा काम तो निकल चुका था।
"हम अब जा रही हैं, अनवर मियां, अगली बार लण्ड को तेल पिला कर लाना।"
फिर हम दोनों ने अपनी गाण्ड मटकाई, और दरवाजा खोल कर नीचे चल दी। कमरे में जा कर हम दोनों मायूस सी लेट गई।
"सीमा, अनवर तो मादरचोद बस देखने भर का ही निकला, मेरी तो मन में ही रह गई।"
"और क्या, भोंसड़ी का मोटा लण्ड हिलाता फिर रहा था, भेन का लौड़ा गाण्ड मरा कर ही गया, था ही वो इस काबिल !" सीमा अपने बोबे को हाथों से दबा कर जैसे मालिश सी कर रही थी।
"उस चूतिये की गाण्ड तो मारनी ही थी, वो था ही इस काबिल !" मैंने अपनी मन की भड़ास निकाली।
हम दोनों ही मन मसोस कर उसे गालियां दिये जा रही थी। सीमा चुद कर भी सन्तुष्ट नहीं थी ... बस उसकी चूत मोटा लण्ड मांग रही थी, जैसे कि मेरी चूत भी मांग रही थी। सीमा ने करवट ली और मेरी पीठ से चिपक गई और मेरी चूंचियां अपने कब्जे में कर ली। हम दोनों अपनी आंखें बंद करके सुस्ताने लगी।
ऐसी ही और इससे भी ज्यादा उत्तेजक बहुत सी नई नई कहानियाँ आप हर रोज पा सकते हैं www.antarvasna.com पर !
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सोमवार, 18 जनवरी 2010
सोमवार, 11 जनवरी 2010
रविवार, 3 जनवरी 2010
रविवार, 27 दिसंबर 2009
Antarvasna Email Club Message
"दीवाना देवर"
आज अन्तर्वासना के कथा-भण्डार से आपके लिए प्रस्तुत है लक्ष्मी बाई द्वारा लिखित कहानी !
लक्ष्मी बाई की कई कहानियाँ जैसे
बन्ना सा री लाडली : http://www.antarvasna.com/story.php?id=1047_kamvali_banna-saa-ri-ladli
कमल खिल गई : http://www.antarvasna.com/story.php?id=0916_koi-mil-gaya_kamal-khil-gai
अन्तर्वासना पर पहले ही प्रकाशित हो चुकी हैं !
गुरूजी
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*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*- "दीवाना देवर" -*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*
मीटर गेज की ट्रेन थी, इसमें एयर कण्डीशन कम्पार्टमेन्ट में सिर्फ़ टू-टियर ही लगता था। कम्पार्टमेन्ट में चार बर्थ थी। सामने एक लगभग 45 वर्ष का व्यक्ति था और उसके साथ में एक जवान युवती थी, करीब 22-23 साल की होगी, साड़ी पहने थी। बातचीत में पता चला कि वो दोनों ससुर और बहू थे।
दिन का सफ़र था, मैं और मेरा देवर सामने के दो बर्थ में थे। बैठे बैठे मैं थक गई थी, सो मैं नीचे के बर्थ पर लेट गई। सामने भी वो युवती बार बार हमें देख रही थी, फिर उस व्यक्ति को देख रही थी। मेरी आंखे बंद थी पर कभी कभी मैं उन्हे देख लेती थी। मेरा देवर आंखे बंद किये ऊंघ रहा था।
अचानक मुझे लगा कि सामने वो आदमी युवती के पीछे हाथ डाल कर कुछ कर रहा है। मुझे शीघ्र ही पता चल गया कि वो उसकी कमर में हाथ डाल कर उसे मल रहा था। वो बार बार उसे देख रही थी और उस पर झुकी जा रही थी, जाहिर था कि युवती को मजा आ रहा था।
मैंने अपनी आँखें कुछ इस तरह से बंद कर रखी थी कि सोई हुई प्रतीत हो। कुछ ही देर में उस आदमी ने उसकी चूंची दबा दी। उस युवती ने अपना हाथ उसके लण्ड पर रख दिया और बड़ी आसक्ति से उसे देखने लगी।
मेरे मन में भी तरंगें उठने लगी, मेरे तन में भी एक हल्की अग्नि जल उठी। मैंने चुपके से देवर को इशारा किया। देवर ने नींद में ही सामने देखा और स्थिति भांप ली। थोड़ी ही देर में देवर भी गरम हो उठा। उसका लण्ड भी उठने लगा। उसने भी अपना हाथ धीरे से मेरी चूंचियों की तरफ़ बढ़ा दिया। मेरी बाहों के ऊपर से उसका हाथ रेंगता हुआ मेरे स्तन पर आ टिका, जिसे उस व्यक्ति ने आराम से देख लिया।
हमें भी इस हालत में देख कर वो कुछ खुल गया और उसने उस युवती की साड़ी के अन्दर हाथ घुसा दिया। लड़की उस आदमी पर लगभग गिरी सी जा रही थी, और उसे बड़ी ही आसक्ति से देख रही थी मानो चुदना चाह रही हो।
मेरे देवर ने भी मेरी चूंचियों पर खुले आम हाथ फ़ेरना शुरू कर दिया। वो व्यक्ति अब मुस्करा उठा और उसने भी खुले आम उस लड़की के ब्लाऊज में हाथ डाल दिया और उसकी चूंचियाँ दबाने और मसलने लगा। यह देख कर मेरे देवर ने मेरे ब्लाऊज में हाथ घुसा कर मेरी नंगी चूंचियाँ पकड़ ली।
अब मैं उठ कर बैठ गई और उस व्यक्ति के सामने ही देवर का लण्ड पैन्ट की जिप खोल कर पकड़ लिया।
उस व्यक्ति ने देखा कि सभी अपने काम में लग गये हैं तो उसने लड़की को लिटा दिया और उसके ऊपर चढ़ गया, अपना लण्ड निकाल कर उसकी साड़ी ऊंची करके उसकी चूत पर लगा दिया। देवर भी मुझे लिटाने का प्रयास करने लगा। मैंने उसे इशारे से मना कर दिया। उधर उस लड़की की आह निकल पड़ी और वो चुदने लगी थी। पर वो मर्द जल्दी ही झड़ गया।
देवर ने उसे इशारा किया तो उसने उसे सहमति दे दी। देवर ने उस लड़की की टांगें ऊंची की और अपना कड़क लण्ड निकाल कर उसकी चूत में घुसा दिया।
मैं बड़ी उत्सुकता से देवर को चोदते हुए देख रही थी। सिसकियों का दौर जारी था। कुछ ही देर में वो दोनों झड़ गये। चुदने के बाद हम सभी आराम से बैठ गये। वो लड़की मेरे देवर को बहुत ही प्यार भरी नजरों से देख रही थी। देवर से रहा नहीं गया तो वो उठा और उसे चूम लिया और उसके स्तन एक बार दबा दिये।
शाम ढल आई थी, ट्रेन स्टेशन पर आ चुकी थी। आगरा फ़ोर्ट आ चुका था। मेरा देवर बोगी के दरवाजे पर खड़ा था। गाड़ी के रुकते ही हम अपने थोड़े से सामान के साथ उतर पड़े। देवर ने सामान अपने साथ ले लिया और हम स्टेशन के बाहर आ गये। एक टेम्पो लेकर पास ही एक होटल में आ गये।
रास्ते भर वासना का खेल देखते हुए और मेरे अंगो से छेड़छाड़ करते हुए आगरा पहुँचे थे। इतनी छेड़छाड़ से मैं उत्तेजित भी हो गई थी। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि बस अब कोई मेरे उभारों के साथ खूब खेले और मुझे मस्त कर दे।
होटल के बिस्तर पर आते ही मैंने अपनी साड़ी खोल कर एक तरफ़ फ़ेंक दी और मात्र पेटीकोट और ब्लाऊज में लेट गई।
मेरा देवर मुझे बड़ी उत्सुकतापूर्वक निहार रहा था। मेरी छातियाँ वासना से फूल और पिचक रही थी। छातियों का उभरना और सिमटना देवरजी को बड़ा ही भला लग रहा था। वो मेरे पास ही बैठ कर मेरे सीने को एकटक निहारने लगा।
मेरी आंख अचानक ही खुल गई। देवर को यूँ घूरते देख कर मैं एक बार फिर से वासना में भर गई। मैं झट से उठ कर बैठ गई। पर इस बात से अनजान कि मेरे ब्लाऊज के दो बटन खुल चुके थे और मेरी गोल गोल उभार ब्रा के साथ बाहर झांकने लगे थे।
देवर का हाथ मेरे उभारों की तरफ़ बढ़ने लगे। जैसे ही उसके हाथ मेरे ब्लाऊज पर गये, मैंने उसके हाथ पकड़ लिये,"देवर जी... हाथ दूर रखिये... क्या इरादा है?" मैंने तिरछी नजरो से उसे निहारते हुए कहा।
देवर एकदम से हड़बड़ा गया,"भाभी, मैं तो ये बटन बंद कर रहा था !" पर उसका लण्ड तो खड़ा हो चुका था, इसलिये मैं तो यही समझी थी कि वो मेरे छातियां मसलना चाहता है। फिर मर्द
नाम का तो वही था मेरे सामने, और उस ट्रेन में लड़की को चोद ही चुका था। मैंने तिरछी निगाहों से उसे देखा और उठ खड़ी हुई और बोली,"तो लगा दे बटन... !"
देवर ने मेरे इशारे को समझ लिया और मेरे ब्लाऊज का बटन लेकर मेरे स्तन दबाते हुए लगाने लगा।
"भाभी ब्लाऊज तो टाईट है...!"
"तो दबा कर लगा दे ना !" मैंने अपने उभारो को थोड़ा और उभार दिया। देवर से रहा नहीं गया और उसके दोनों हाथों ने मेरे स्तनों को घेर लिया और अपने हाथों में कस लिया।
"हाय रे देवर जी... इन्हें तो छोड़ो ना... ये ब्लाऊज थोड़े ही है...!" मैंने उसे हल्का सा धक्का दे दिया और हंसती हुई बाथ रूम में चली गई। देवर मुझे प्यासी नजरों से देखता रह गया। मैंने अच्छी तरह नहाया धोया और फ़्रेश हो कर बाहर आ गई।
कुछ ही देर में देवर भी फ़्रेश हो गये थे। उसके हाथ अभी भी मेरे अंगों को मसलने के लिये बैचेन हो रहे थे। उसके हाथ कभी मेरे चूतड़ों पर पड़ते थे और कभी किसी ना किसी बहाने छाती से टकरा जाते थे।
हम दोनों तैयार हो कर नीचे खाना खाने आ गये थे। रात के नौ बज रहे थे, हम बाहर होटल के बाग में टहलने लगे। मेरा मन तो देवर पर लगा था । मन ही मन देवर से चुदने की योजना बना रही थी। मेरे तन बदन में जैसे आग सी लगी थी। तन की अग्नि को मिटाना जरूरी था।
मैंने देवर के चूतड़ों पर हाथ मार कर देखा तो पता चला कि उसने अंडरवियर नहीं पहनी थी। उसके नंगे से चूतड़ो का मुझे अहसास हो गया था।
मैंने भी पजामे के नीचे पेंटी और कुर्ते के अन्दर ब्रा नहीं पहनी थी। बाग में घूमते घूमते मैंने कहा,"देवर जी, मैं एक चीज़ बताऊँ...!"
"हां बताओ ..." उसने उत्सुकता से पूछा।
"पहले आंखें बंद करो... फिर एक जादू बताती हूँ..." मैंने शरारत से कहा। मेरी वासना उबल रही थी।
उसने आंखें बंद कर ली। मैंने अपना हाथ धीरे से उसके उठते हुए लण्ड पर रख दिया,"देवर जी आंखें बंद ही रखना... प्लीज मत खोलना ...!" धीरे से मैंने उसके लण्ड पर कसाव बढ़ा दिया
"आह... भाभी...!" उसके मुख से आह निकल पड़ी।
"देखो आंखें नहीं खोलना... तुम्हे मेरी कसम...!" और लण्ड को हौले से उपर नीचे करने लगी।
"सी सीऽऽऽऽऽऽ... आह रे..." उसकी सिसकारियाँ फ़ूट पड़ी।
"तुम्हें मेरी कसम है... आंख बंद ही रखना...!" मैंने सावधानी से बाग में इधर उधर देखा, और पजामे में हाथ घुसा कर उसका नंगा लण्ड थाम लिया। बस मसला ही था कि कुछ आहट हुई, मैंने तुरन्त ही हाथ बाहर खींच लिया। देवर की आंखें खुल गई,"भाभी, मैं कोई सपना देख रहा था क्या ?"
"चुप भी रहो... बड़ा आया सपने देखने वाला... अब चलो कमरे में..." मैंने उसे झिड़कते हुए कहा ।
हम दोनों वापस कमरे में आ गये। डबल बेड वाला कमरा था। देवर बड़ी आस लगाये मुझे देख रहा था। पर मैंने अपने बिस्तर पर लोट लगा दी और आंखें बंद करके लेट गई। देवर ने बत्ती बुझा दी। मैं इन्तज़ार करती रही कि इतना कुछ हो गया है, देवर जी चोदे बिना नहीं छोड़ेंगे। पर बस मैं तो इन्तज़ार ही करती रह गई। उसने कुछ नहीं किया। अंधेरे में मैंने उसे देखने का प्रयास किया, पर वो तो चित्त लेटा आंखें बंद किए हुए था।
मुझे कुलबुलाहट होने लगी, चूत में आग लगी हुई थी और ये लण्ड लिये हुए सो रहा था। अब मैंने सोच लिया था कि चुदना तो है ही। मैंने धीरे से अपने पूरे कपड़े उतार लिये। फिर देवर के पजामे का नाड़ा धीरे से खींच कर ढीला कर दिया और पजामा नीचे खींच दिया। उसका लण्ड सीधा तना हुआ खड़ा था। यानि उसका लण्ड मुझे चोदने के लिये तैयार था।
मैं धीरे से उठी और देवर के ऊपर चढ़ कर बैठ गई। उसके लण्ड को सीधे ही अपनी चूत से लगा दिया और धीरे से जोर लगा दिया। उसका लण्ड फ़क से अन्दर घुस गया। देवर या तो पहले से ही जगा हुआ था या आधी नींद में था... झटके से उसकी आंख खुल गई। पर देर हो चुकी थी। मैंने उसके जिस्म पर कब्जा कर लिया था और उसके ऊपर लेट कर उसे जकड़ लिया था।
मेरी चूत जोर लगा कर उसके लण्ड को लील चुकी थी।
"अरे...रे... भाभी... ये क्या... हाय रे... " उसके लण्ड में मीठी मीठी गुदगुदी हुई होगी। उसके हाथ मेरी कमर पर कसते चले गये।
"देवर जी, नींद बहुत आ रही है क्या...? फिर तेरी भाभी का क्या होगा...?"
"मैं तो समझा था कि आप मुझसे सेक्सी मजाक कर रही हैं... !"
"हाय... देवर जी... लण्ड और चूत में कैसी दोस्ती... लण्ड तो चूत को मारेगा ही...!"
"भाभी, आप बड़ी प्यारी है... मेरा कितना ध्यान रखती हैं... आह रे... लण्ड के ऊपर बैठ जाओ ना...!"
देवर ने बत्ती जला दी। मैं अपनी पोजीशन बदल कर खड़े लण्ड पर सीधे बैठ गई। लण्ड चूत में जड़ तक उतर गया और पैंदे से टकरा गया। हल्का सा दर्द हुआ। उसके हाथ आगे बढ़े और मेरी चूंचियों को अपने कब्जे कर लिया और उन्हें मसलने लगा। मेरा जिस्म एक बार फिर से मीठी आग में जल उठा। मैं धीरे से उस पर लेट गई और हौले हौले चूत ऊपर नीचे करके लण्ड को अन्दर बाहर करके स्वर्गीय आनन्द लेने लगी।
उसके होंठों को अपने होंठों में दबा लिया और सिसकारी भर भर कर हिलते हुए चुदने लगी। देवर भी वासना भरी आहें भरने लगा। पर देवर ने जल्दी ही मुझे कस कर लपेट लिया और और एक कुलांची भर कर ऊपर आ गया। मुझे उसने दबा लिया।
पर अब उसके लण्ड का निशाना मेरी गाण्ड थी। इशारा पाते ही मैंने अपनी गाण्ड थोड़ी सी ऊंची कर ली । बस फिर तो राही को रास्ता मिल गया और मेरे चूतड़ों के पट खोलते हुए छेद पर आ टिका, उसने मेरी आंखों में आंखें डाल दी और आंखों ही आंखों में मुझे चोदने लगा। मैं उसके आंखों के वार सहती रही... मेरी आंखें चुदती रही... और मेरे मुख से आह निकल पड़ी।
उसका प्यारा सा लण्ड मेरी गाण्ड में उतर गया। प्यार से वो मुझे आंखों से चोदता रहा... उसकी ये प्यारी स्टाईल मुझे अन्दर तक मार गई। मेरी आंखों में एकटक देखने से पानी आ गया और मैंने अपने चक्षु धीरे से बन्द कर लिये। मेरी गाण्ड लण्ड को पूरा निगल चुकी थी। गाण्ड की दीवार में तेज गुदगुदी चल रही थी। उसके धक्के तेज हो गये थे... लग रहा था कि उसका माल निकलने वाला है।
मैंने उसे इशारा किया और उसके पलक झपकते ही लण्ड गाण्ड में से निकाल कर चूत में फिर से पेल दिया। मेरा अन्तरंग आनन्द से नहा गया। चूत की चुदाई स्वर्ग जैसी आनन्ददायी लग रही थी। मेरी चूत उछल उछल कर उसका साथ देने लगी।
मेरे जिस्म में तंरगें उठने लगी... सारा शरीर सनसनाहट से भर उठा। सारा शरीर आनन्द से भर उठा। आंखे बंद होने लगी। देवर का लण्ड भी मोटा प्रतीत होने लगा। दोनों ओर से भरपूर कसावट के साथ चुदाई होने लगी।
लण्ड मेरी चूत में तरावट भर रहा था। मेरी चूत अब धीरे धीरे रस छोड़ने लगी थी। ... और अचानक उसका लण्ड अत्यन्त कठोर होकर मेरी चूत के पेंदे में गड़ने लगा और फिर एक गरम गरम सा अहसास होने लगा। उसका वीर्य मेरी चूत में भरने लगा। तभी मेरी चूत ने भी अंगड़ाई ली और उसके वीर्य में अपना रस भी उगल दिया। दोनों रस एक हो गये और चूत में से रिसने लगे।
देवर ने मुझे कस कर दबोच रखा था और चूतड़ को दबा दबा कर अपना वीर्य निकाल रहा था। मैं भी चूत को ऊपर उठा कर अपना पानी निकाल रही थी। देवर ने पूरा वीर्य चूत में खाली कर दिया और उछल कर खड़ा हो गया। मैंने भी सन्तुष्ट मन से करवट बदली और गहरी नीन्द में सो गई। सुबह देर से उठी तब तक देवर उठ चुका था। मुझे जगा हुआ देख कर उसने मेरी टांगें ऊपर की और मेरी चूत को खोल कर एक गहरा चुम्बन लिया।
"घर में भाभी का होना कितना जरूरी है यह मुझे आज पता चला...! है ना...?" देवर ने प्यार से देखा।
"हां सच है...पर देवर ना हो तो भाभी किससे चुदेगी फिर... बोलो...?" हम दोनों ही हंस पड़े और बाहर जाने की तैयारी करने लगे...।
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